जाने अनजाने में ही सही पर कोई अपना सा लग रहा था |
नया नया चेहरा था, नयी नयी बाते थी
फिर भी कोई अपना सा लग रहा था
खून का रिश्ता तो नहीं था
फिर भी सागर की गहराईयो जैसा रिश्ता बन रहा था
जब चल रहे थे हम अकेले तब कोई अपना सा बन रहा था |
हर कदम पर साथ मेरे वो चले जा रहा था
हर शरारतों में साथ मेरे वो दिये जा रहा था
हर एक दुःख को साथ मेरे वो बांटे जा रहा था
जब चल रहे थे हम अकेले तब कोई अपना सा बन रहा था |
अँधेरे रास्तों से कोई मुझे हरदम निकाले जा रहा था
कोई मेरे गमो को भी अपना गम समझ कर लिए जा रहा था
पल पल खुशियाँ वो मुझे हरदम दिए जा रहा था
जब चल रहे थे हम अकेले तब कोई अपना सा बन रहा था |
गहरे होते इस रिश्ते को नाम दिया हमने दोस्ती
गहरे होते इस रिश्ते को नाम दिया हमने दोस्ती
कभी रूठें वो कभी रूठु मैं
पर हर परीक्षा में पास हो जाती हमारी ये दोस्ती |
अब चल रहा हु मैं एक रास्ते
अब चल रहा है वो भी एक रास्ते
भले ही अलग हो गए हमारे रास्ते
पर आज भी निभा रहे हैं हम अपनी ये दोस्ती |
जब चल रहे थे हम अकेले तब कोई अपना सा बन रहा था
जाने अनजाने में ही सही पर कोई अपना सा लग रहा था |
Very nice👌👌
ReplyDeleteThank u :)
DeleteGood one. Pk
ReplyDeleteThank u :)
DeleteReally good ,keep posting nice poems
ReplyDeleteYour friend
RAB
Sure will do..Thank u :)
DeleteMujhe lagta hai bhai apko ek mitra ki jarurat hai!
ReplyDeleteQuit good lines... ...
Hehe.....mitra to hai bhai...Thank u :)
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