यूँ अकेले बैठकर यहाँ पर
सोचता हूँ मैं कभी
कहाँ से चले थे हम
अब कहाँ आ गए है अभी
बचपन की भूली बिसरी यादों मैं
जब जब खो जाते है
आते है वो सारे पल याद
जहाँ हमने स्वर्णिम पल बिताएं है
याद आते है वो पल बहुत ज्यादा
जो बचपन में परिवार के साथ बिताये हैं
नन्हें नन्हें पैरों से दौड़कर हमने
जब अपने माँ ,ताई ,दादी और पूरे परिवार को अपने पीछे भगाये हैं
घर रहकर ना जाने
क्या क्या धमा चौकड़ी किया करते थे
पूरा दिन ख़ुशी से निकलता था
ओर हम हमेशा उसी के नशे में रहते थे
थोड़े बड़े जब हुए
पढ़ाई परीक्षा के बोझ सर पर पड़े
थोड़ा समय तो अपनों के साथ बिताना कम हुआ
पर प्यार समय के साथ हमेशा बढ़ा
कदम जब जवानी में रखे
कुछ नये लोगों से हम मिले
कुछ लोगों से दिल लगा
ओर कुछ नये रिश्ते तब बने
वक़्त तो बहुत हसीन चल रहा था
ना जाने सारा समय रेत की तरह कहा फ़िसल रहा था
पर अच्छी ओर बुरी चीज का अंत जरूर होता है
कुछ यही पल मेरे जीवन में भी धीरे धीरे आ रहा था
दिल को थामे हुए जब होना पड़ा जुदा
अपने घर से, कुछ नए रास्तो के लिए
रोया तो बहुत था दिल अंदर से
पर आँसू नहीं झलकने दिया पलकों पर, अपनों की खुशियों के लिए
नया शहर नये लोग
धीरे धीरे मन को भा रहे थे
पर कुछ पुराने रिश्तों की डोर
धीरे धीरे टूटने की और बढ़ रहे थे
बहुत सारे सवालों के उत्तर दिए बिना वो अपने रास्ते जा रहे थे
जीवन की नैय्या एक अच्छे मुकाम पर जरूर है
पर क्या अपने परिवार से दूर रहकर ये मन खुश है ?
सवाल जितना छोटा ओर सीधा है
उसका उत्तर उतना ही जटिल है
दिल को मना लेना पड़ता है
जब जब ये यादों का तूफान उठता है
हम हैं यहां
तभी तो अपनासा कोई वहां खुश रहता है
यूँ तो चारों तरफ सन्नाटा नहीं यहाँ पर भी
पर भीड़ में रहकर भी अकेलापन जरूर है
अब चाहें कोई भी थामे हाथ हमारा
पर दिल को तो सिर्फ कुछ चुनिंदा लोग पसंद है
यही पटकथा है जीवन की
जो अब हमे जीना हैं
चाहें हो पास या दूर
अपने घर परिवार को ही बस
अपने दिल में रखना है |
यूँ अकेले बैठकर यहाँ पर
सोचता हूँ मैं कभी
कहाँ से चले थे हम
अब कहाँ आ गए है अभी
कहाँ से चले थे हम
अब कहाँ आ गए है अभी
बचपन की भूली बिसरी यादों मैं
जब जब खो जाते है
आते है वो सारे पल याद
जहाँ हमने स्वर्णिम पल बिताएं है
याद आते है वो पल बहुत ज्यादा
जो बचपन में परिवार के साथ बिताये हैं
नन्हें नन्हें पैरों से दौड़कर हमने
जब अपने माँ ,ताई ,दादी और पूरे परिवार को अपने पीछे भगाये हैं
घर रहकर ना जाने
क्या क्या धमा चौकड़ी किया करते थे
पूरा दिन ख़ुशी से निकलता था
ओर हम हमेशा उसी के नशे में रहते थे
थोड़े बड़े जब हुए
पढ़ाई परीक्षा के बोझ सर पर पड़े
थोड़ा समय तो अपनों के साथ बिताना कम हुआ
पर प्यार समय के साथ हमेशा बढ़ा
कदम जब जवानी में रखे
कुछ नये लोगों से हम मिले
कुछ लोगों से दिल लगा
ओर कुछ नये रिश्ते तब बने
वक़्त तो बहुत हसीन चल रहा था
ना जाने सारा समय रेत की तरह कहा फ़िसल रहा था
पर अच्छी ओर बुरी चीज का अंत जरूर होता है
कुछ यही पल मेरे जीवन में भी धीरे धीरे आ रहा था
दिल को थामे हुए जब होना पड़ा जुदा
अपने घर से, कुछ नए रास्तो के लिए
रोया तो बहुत था दिल अंदर से
पर आँसू नहीं झलकने दिया पलकों पर, अपनों की खुशियों के लिए
नया शहर नये लोग
धीरे धीरे मन को भा रहे थे
पर कुछ पुराने रिश्तों की डोर
धीरे धीरे टूटने की और बढ़ रहे थे
बहुत सारे सवालों के उत्तर दिए बिना वो अपने रास्ते जा रहे थे
जीवन की नैय्या एक अच्छे मुकाम पर जरूर है
पर क्या अपने परिवार से दूर रहकर ये मन खुश है ?
सवाल जितना छोटा ओर सीधा है
उसका उत्तर उतना ही जटिल है
दिल को मना लेना पड़ता है
जब जब ये यादों का तूफान उठता है
हम हैं यहां
तभी तो अपनासा कोई वहां खुश रहता है
यूँ तो चारों तरफ सन्नाटा नहीं यहाँ पर भी
पर भीड़ में रहकर भी अकेलापन जरूर है
अब चाहें कोई भी थामे हाथ हमारा
पर दिल को तो सिर्फ कुछ चुनिंदा लोग पसंद है
यही पटकथा है जीवन की
जो अब हमे जीना हैं
चाहें हो पास या दूर
अपने घर परिवार को ही बस
अपने दिल में रखना है |
यूँ अकेले बैठकर यहाँ पर
सोचता हूँ मैं कभी
कहाँ से चले थे हम
अब कहाँ आ गए है अभी
Bhai,❤️bht pyari
ReplyDeleteThank u :)
DeleteMast h bhai, aur bhi likh , kuch naya
DeleteHeart touching poem👌👌
ReplyDeleteThank u :)
DeleteWelldone..bhut sunder👌👌
ReplyDeleteThank u :)
DeleteBeautiful
ReplyDeleteThank u :)
DeleteMast h bhai, ek aur likho......
ReplyDeleteThanks...Bilkul bhai likhege...
Deletebhut sunder
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